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July 31, 2015

इक नज़्म की चोरी

इक नज़्म की चोरी


इक नज़्म मेरी चोरी कर ली कल रात किसी ने
यहीं पड़ी थी बालकनी में,
गोल तिपाई के ऊपर थी!
विस्की वाले ग्लास के नीचे रक्खी थी
शाम से बैठा,
नज़्म के हल्के-हल्के सिप मैं घोल रहा था होठों में,
शायद कोई फ़ोन आया था-
अंदर जा के, लौटा तो फिर नज़्म वहाँ से गायब थी।

अब्र के ऊपर नीचे देखा

सुर्ख़ शफ़क़ की जेब टटोली
झाँक कर देखा पार उफुक के
कहीं नज़र न आई, फिर वो नज़्म मुझे!

आधी रात आवाज़ सुनी, तो उठ के देखा
टाँग पे टाँग रखे, आकाश में
चाँद तरन्नुम में पढ़ पढ़ के
दुनिया को अपनी कहके नज़्म सुनाने बैठा था।

गुलजार : कूछ और नझमे  kuch aur nazme

July 20, 2014

मुझको इतने से काम पे रख लो...

गुलज़ार...


मुझको इतने से काम पे रख लो...
जब भी सीने पे झूलता लॉकेट
उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से
सीधा करता रहूँ उसको
मुझको इतने से काम पे रख लो...
जब भी आवेज़ा उलझे बालों में
मुस्कुराके बस इतना सा कह दो
आह चुभता है ये अलग कर दो
मुझको इतने से काम पे रख लो....
जब ग़रारे में पाँव फँस जाए
या दुपट्टा किवाड़ में अटके
एक नज़र देख लो तो काफ़ी है
मुझको इतने से काम पे रख लो...